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हर नए फोन में 'संचार साथी' अनिवार्य: DoT का बड़ा आदेश, साइबर फ्रॉड रोकने की तैयारी

सरकार ने स्मार्टफोन में 'संचार साथी' ऐप प्री-इंस्टॉल करना अनिवार्य किया। यह ऐप डिलीट नहीं होगा, जिसका लक्ष्य चोरी और धोखाधड़ी रोकना है, पर गोपनीयता को लेकर चिंताएँ हैं। 90 दिन की समय सीमा।

Cyber Doot X. | Published by: Rajesh Yadav | Updated Wed, 03 Dec 2025 04:40 PM IST | Views: 298

नई दिल्ली: भारत सरकार ने साइबर धोखाधड़ी और मोबाइल फोन की चोरी को रोकने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। दूरसंचार विभाग (DoT) ने सभी स्मार्टफोन निर्माताओं, जिसमें Apple, Samsung, Xiaomi, Vivo, और Oppo जैसी प्रमुख कंपनियाँ शामिल हैं, को यह अनिवार्य निर्देश दिया है कि वे 'संचार साथी' (Sanchar Saathi) ऐप को भारत में बेचे जाने वाले हर नए फोन में प्री-इंस्टॉल करें। यह नया नियम अगले 90 दिनों के भीतर लागू हो जाएगा।

अनिवार्य इंस्टॉलेशन और डिलीट न होने की शर्त

यह निर्देश न केवल इंस्टॉलेशन को अनिवार्य बनाता है, बल्कि इसमें एक महत्वपूर्ण शर्त यह भी है कि यूज़र इस ऐप को अपने डिवाइस से हटा नहीं सकेंगे। सरकार का उद्देश्य इसे एक स्थायी सुरक्षा उपकरण बनाना है।

मुख्य उद्देश्य:

  • चोरी पर लगाम: खोए या चोरी हुए मोबाइल फोन को ब्लॉक या ट्रैक करना।
  • धोखाधड़ी पर रोक: फर्जी IMEI नंबरों और टेलीकॉम फ्रॉड की रोकथाम करना।
  • सब्सक्राइबर सुरक्षा: मोबाइल कनेक्शन की जाँच और संदिग्ध गतिविधि की रिपोर्ट करना।

विश्व का सबसे बड़ा साइबर सुरक्षा कदम

भारत में 1.2 अरब से अधिक मोबाइल सब्सक्राइबर हैं। सरकार का मानना है कि यह पहल, अपनी व्यापकता के कारण, दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे महत्वाकांक्षी साइबर सुरक्षा कदम होगा।

यह ऐप पहले ही अपनी क्षमता साबित कर चुका है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, ऐप की मदद से अब तक 7 लाख से अधिक खोए या चोरी हुए फोन वापस मिल चुके हैं, जिनमें अकेले अक्टूबर 2025 में 50,000 फोन शामिल हैं।

कार्यान्वयन और तकनीकी चुनौतियाँ

दूरसंचार विभाग (DoT) ने कंपनियों को इस आदेश को लागू करने के लिए दो-आयामी रणनीति अपनाने का निर्देश दिया है:

  1. नए फोन: सभी नए स्मार्टफोन बिक्री से पहले ही ऐप के साथ बाज़ार में आएंगे।
  2. पुराने स्टॉक: कंपनियों को मौजूदा इन्वेंट्री (पुराने स्टॉक) में सॉफ़्टवेयर अपडेट के ज़रिए यह ऐप यूज़र्स के डिवाइस में डालना होगा।

तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि Apple जैसी कंपनियाँ, जो अपने इकोसिस्टम और यूज़र प्राइवेसी पर सख्त नियंत्रण रखती हैं, इस तरह के डिलीट न हो सकने वाले (non-removable) ऐप के अनिवार्य इंस्टॉलेशन का विरोध कर सकती हैं।

गोपनीयता और निगरानी की चिंताएँ

हालांकि इसका उद्देश्य साइबर सुरक्षा सुनिश्चित करना है, लेकिन इस कदम ने यूज़र गोपनीयता (Privacy) को लेकर चिंताएँ भी बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि एक ऐसा ऐप जिसे हटाया नहीं जा सकता, वह सरकारी निगरानी (Government Surveillance) को बढ़ावा दे सकता है, भले ही वर्तमान में इसका उद्देश्य नेक हो। सरकार को इन चिंताओं को दूर करने के लिए ऐप के डेटा उपयोग और संग्रह नीतियों में पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी।

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